परिप्रेक्ष्य
नज़र तो कई सारे हैं लेकिन नज़रियें कितने हैं
सफल तो कई सारे हैं लेकिन बेसबर कितने हैं
तोडे़ ना टूटे , इतनी मज़बूत ये संकोच की डो़री हैं
जो एक बार हमसे बंध जाए , तो चाहाकर भी हमारा साथ नहीं छोड़ती हैं
-वृंदा दीपराज जोशी
सफल तो कई सारे हैं लेकिन बेसबर कितने हैं
तोडे़ ना टूटे , इतनी मज़बूत ये संकोच की डो़री हैं
जो एक बार हमसे बंध जाए , तो चाहाकर भी हमारा साथ नहीं छोड़ती हैं
-वृंदा दीपराज जोशी
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