मन के ख्याल


 आखिर क्यों है मन ये दुखी?

आखिर क्यों है उस पेड़ की डाल सुखी?

मुसाफिर बन निकले हैं, सोचकर खोजलेंगे मंज़िल

कया उसे ढूंडलेंगे? या वो वही है जिससे भूलजाने की की थी हमने पूरी कोशिश

दिल कुछ मांगता है, कीमत बिना बताये

हर बार याद दिलाता है उसकी , जिसकी मन में बैठे है हम अस्थिया सजाए

आस पास घूमने वाले कहते रहे की कुछ बदल से गए हैं हम

अरे उन्हें कौन समझाए की कुछ डब्ब से गए हैं हम

अजीब ख्यालों में , बीतीं यादों में

 कुछ खो से गए हैं हम

ज़िंदगी तो सिर्फ दुसरो को खुशियां बाँट रही है

शायद हमारे दरवाज़े तक पोहोचने में कुछ देर सी लगा रही है

केहकर की सब सही होगा , बस हार मत मानना कुछ छोड़ गए हमे अकेले ,सीखकर मौत से घबराना

 काश कभी न ढलती वो शाम , कभी न बीत ती वो रात

 जो काम पढ़ गयी थी , उस दिल तक पोहोचने हमारी बात

रात का अँधेरा कुछ को घबराए

कुछ उसी अंधेरे में एक तस्सल्ली सी पाए

जब दर्द ही था दिखाई देता

तब याद कर किसी की हसी , मन भुला देता

हर उस गम को, जो हमसे सुख चैन चुरा लेता

सारी बातें सुनाई दी थी सुरो में,

जब उन आँखों ने पलके झपकाई थी लज्जा में

अगर इस नादान दिल को पता होता की नहीं रहते ख़ुशी के पल साथ, बिना कही खो जाए

तो शायद आज हम कहते की रात के अंधेरे से यह दिल भी घबराए

                                                            - वृंदा दीपराज जोशी

Comments

Popular posts from this blog

Laal Chunni

मलमल की साड़ी

Minimalism - Book review