किनारा तो पास था लेकिन मैं अपनी प्यास बुझा नहीं पाया
मैं हार गया प्यार कर
मैं हार गया सब कुछ वार कर
सारी खुशी गवा बैठा, औरो के आँसु पोछकर
देखता रहा मंजिल तक पोहचाने वाले रास्ते को, पर उस राह पर चल ना पाया
किनारा तो पास था लेकिन मैं अपनी प्यास बुझा नहीं पाया
मटके का पानी बेह गया, औरो की आँखो से धूल मिटाकर
मन से सुख छिन गया, किसी और के दिए हुए दर्द में वक्त बिताकर
सोचता रहा सपनो को पुरा करने के बारे में, लेकिन पुरा कर ना पाया
किनारा तो पास था लेकिन मैं अपनी प्यास बुझा नहीं पाया
जिंदगी काटता रहा प्यार फैलाकर
लेकिन खुदसे की बैमानी, भीड में मुह छिपाकर
अपनो का दिल दुखाया लेकिन ओरो को सच न बोल पाया
किनारा तो पास था लेकिन मैं अपनी प्यास बुझा नहीं पाया
- वृंदा दीपराज जोशी

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