मलमल की साड़ी
मलमल की साड़ी
मेरी मलमल की साड़ी में हल्दी का दाग है
मेरी चूड़ियों से सजी कलाइयो पे ज़ख्मो का बाग है
धूप में सुख रही मिर्ची में सूरज की आग है
पास राखी कढ़ाई में बच्चों का मनपसंद साग है
जोड़ रही हूं मैं धीमे धीमे से, ऊन के धागे
ये सर्दी में निभाएंगे मेरे अपनों को गरम रखने के वादे
कुट ती हू जब मैं मसलो को पत्थर माई
तो साथ कुत देती हूं बुरी नजर वाली आंखें
जो मेरे अपनों के लिए गुलाब की पत्ती नहीं, हो जैसी बातें
पास बैठी हुई कोयल मुझसे पूछती है गाकर ये गीत
कितना तू अपनों के लिए मन में रखती है प्रीत?
कोयल की काली पंख मेरी आँखों के काजल से मिलती है
कोयल के सुर मेरे बच्चों की लोरी जैसी सुनती है
मेरी पहचान मेरे अपनों में है
मेरे मलमल की साड़ी पे लगे हुए दागो में है
अपनों के लिए जीकर मैंने कुछ ना खोया
मेरी मलमल की साड़ी से दूर होकर ही मेरा बच्चा था रोया|
- वृंदा दीपराज जोशी

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