लापता


 










आज शाम जब निकलू अपने घर से 

तब कहा ढूंढू तुझे?


 गलियों के बीच या सड़क के किनारे?


 हर बार जब याद आये तेरी ,


तब क्या सोच कर याद करु तुझे? 


तेरे गालों की लाली या आँखों में छुपे सितारे?


 लापता है तू हमसे, जैसा कोई परवाना उसके उजाले से 


कहां कहां ढूंढा तुझे, ये पूछना अपनी गली के रहने वालो से 


मैने एक रात नहीं बितायी सुकून की नींद में 


अब ये मत कहना ,क्योंकि देखते हैं हम तुझे अपने ख्वाबों में 


तुझपे हकीकत में शायद मेरा हक ना हो, 


लेकिन पूरा है अपने ख्यालों में 


सब कहते हैं मुझसे कि इस सब का कोई फ़ल नहीं होगा 


हम तो फालतू को चकते रहे तेरे आने के हर इंतज़ार में|


- वृंदा दीपराज जोशी

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